Tuesday, June 22, 2010

बहकीसी बारीश

बहकीसी बारीशने फीर
यादोंकी गठरी खुलवाई
मीले चन्द लम्हे घायल
और ढेर सी रुसवाई

कुछ सुनेसे सन्नाटे थे
और ख्वाहीशें दबी दबी
यूँ रखें थे कुछ अरमान
छोड़ा हो जैसे अभी अभी
चद्दर सी उम्मीद मीली
कई जगह थी सील्वाई
मीले चन्द लम्हे घायल
और ढेर सी रुसवाई

हर सीलवट मे ग्ठरीके
बुनेबुनाये ख्वाब मीले
भीगी चांदनी रातोंके
महकेसे महताब मीले
सीमटीसी खुदहीमे और
इक तहजीब नजर आयी
मीले चन्द लम्हे घायल
और ढेर सी रुसवाई

- गुरु ठाकुर .

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