बहकीसी बारीशने फीर
यादोंकी गठरी खुलवाई
मीले चन्द लम्हे घायल
और ढेर सी रुसवाई
कुछ सुनेसे सन्नाटे थे
और ख्वाहीशें दबी दबी
यूँ रखें थे कुछ अरमान
छोड़ा हो जैसे अभी अभी
चद्दर सी उम्मीद मीली
कई जगह थी सील्वाई
मीले चन्द लम्हे घायल
और ढेर सी रुसवाई
हर सीलवट मे ग्ठरीके
बुनेबुनाये ख्वाब मीले
भीगी चांदनी रातोंके
महकेसे महताब मीले
सीमटीसी खुदहीमे और
इक तहजीब नजर आयी
मीले चन्द लम्हे घायल
और ढेर सी रुसवाई
- गुरु ठाकुर .
No comments:
Post a Comment